कहना है

कई बार बहुत कुछ कहने का मन करता है.लेकिन शब्द नहीं मिलते.कागज कोरे ही रह जाते हैं.शब्द जब लेखनी के रूप में ढलता है तो इस ब्लॉग के रूप में प्रकट होता है.

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शब्द अशेष

Posted On: 19 Mar, 2012 में

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pranay giit
इन प्रणय के कोरे कागज पर
कुछ शब्द ढले नयनों से
आहत मोती के मनकों को
चुग डालो प्रिय अंखियों से
    कितने चित्र रचे थे मैंने
    खुली हथेली पर
    कितने छंद उकेरे तुमने
    नेह पहेली पर
अवगुंठन खुला लाज का
बांच गए पोथी मन मितवा
जीत गई पिछली मनुहारें
खिले फूल मोती के बिरवा
    भोर गुलाबी सप्त किरण से
    मन पर तुम छाए
    जैसे हवा व्यतीत क्षणों को
    बीन – बीन लाए
बरसों बाद लगा है जैसे
सोंधी गंध बसी हों मन में
मीलों लम्बे सफ़र लांघकर
उम्र हँसी हों मन दर्पण में
    नदिया की लहरों से पुलकित
    साँझ ढले तुम आए
    लगा कि मौसम ने खुशबू के
    छंद नए गाए.

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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

minujha के द्वारा
March 24, 2012

बरसों बाद लगा है जैसे सोंधी गंध बसी हों मन में मीलों लम्बे सफ़र लांघकर उम्र हँसी हों मन दर्पण में दिल छूती पंक्तियां,सुंदर रचना हेतु बधाई

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 25, 2012

    धन्यवाद ! मीनू जी.सराहना के लिए आभार.

Sumit के द्वारा
March 22, 2012

भोर गुलाबी सप्त किरण से मन पर तुम छाए जैसे हवा व्यतीत क्षणों को बीन – बीन लाए………….सुंदर पंक्तिया http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/03/16/घोड़े-और-क्रिकेट-का-मेल/

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्यवाद ! सुमित जी.सराहना के लिए आभार.

March 21, 2012

सादर प्रणाम! बरसों बाद लगा है जैसे सोंधी गंध बसी हों मन में मीलों लम्बे सफ़र लांघकर उम्र हँसी हों मन दर्पण में………मन के भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति…..हार्दिक बहार.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्यवाद ! अनिल जी.सराहना के लिए आभार.

mparveen के द्वारा
March 20, 2012

झा जी नमस्कार, सुंदर प्रस्तुति के लिए बधाई …

    nishamittal के द्वारा
    March 20, 2012

    सुन्दर प्रस्तुति झा जी.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! परवीन जी.सराहना के लिए आभार.

satish3840 के द्वारा
March 20, 2012

झा साहब नमस्कार /* सुंदर प्रस्तुती /

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! आदरणीय सतीश जी.ब्लॉग पर आपका स्वागत है.आपकी पहली प्रतिक्रिया के लिए आभार.

akraktale के द्वारा
March 19, 2012

राजीव जी, बस अप्रतीम. कुछ और नहीं है कहने को.ऐसा बहुत ही कम होता है की मै अपने शब्दों को कमजोर महसूस करूँ मगर आज निरुत्तर हूँ.जितनी बार रचना पढ़ रहा हूँ उतना ही आनंद और बढ़ता ही जा रहा है. हार्दिक बधाई.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! आदरणीय अशोक जी.मैं तो आपकी रचनाओं का कायल हूँ.कविता पसंद आई,यह जानकर अच्छा लगा.सराहना के लिए आभार. …राजीव

'राही अंजान' के द्वारा
March 19, 2012

बरसों बाद लगा है जैसे सोंधी गंध बसी हों मन में मीलों लम्बे सफ़र लांघकर उम्र हँसी हों मन दर्पण में !!! . बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ…..आदरणीय राजीव जी !! बहुत आनंद आया पढ़कर !! :)  :)

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्यवाद! संदीप जी.मुझे तो आपकी कविताएँ एवं गजल बहुत पसंद हैं.सराहना के लिए आभार.

    'राही अंजान' के द्वारा
    March 22, 2012

    ये तो आपका बड़प्पन है आदरणीय ! :)

yogi sarswat के द्वारा
March 19, 2012

राजीव कुमार झा जी , नमस्कार ! बदलते मौसम के साथ आपने भी बदले हुए रंग में सराबोर कविता प्रस्तुत करी है ! भोर गुलाबी सप्त किरण से मन पर तुम छाए जैसे हवा व्यतीत क्षणों को बीन – बीन लाए बहुत सुन्दर और खूबसूरत भाव ! बधाई !

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! योगी जी.कविता पसंद आई,यह जानकर अच्छा लगा.सराहना के लिए आभार.

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 19, 2012

राजीव जी नमस्कार, प्रणय निवेदन का मनोहारी चित्रण……सुन्दर अति सुन्दर….. http://ajaydubeydeoria.jagranjunction.com

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! अजय जी.सराहना के लिए आभार.

dineshaastik के द्वारा
March 19, 2012

भाव पूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति….

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! दिनेश जी.सराहना के लिए आभार.

vikramjitsingh के द्वारा
March 19, 2012

राजीव जी सादर, ऐसे रोमांटिक निवेदन को भला कौन ठुकरा सकता है, बहुत ही सुंदर हैं ये पंक्तियाँ.. खैर, ‘मौसम ने तो खुशबू के छंद गाए’ आपने क्या कहा, हम बताते हैं…… ”पूछा जो हमने उनसे, चाँद निकलता है किस तरह..? तो जुल्फों को मुख पे डाल के झटका दिया कि ‘यूँ’………”. गुस्ताखी माफ़, राजीव जी,,,,,

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! विक्रमजीत जी.सराहना के लिए आभार.आपकी प्रतिक्रिया लाजबाब है.बहुत सुन्दर शेर है.अपना स्नेह बनाये रखियेगा. आभार सहित, …राजीव

chandanrai के द्वारा
March 19, 2012

आदरणीय राजीव जी, सादर अभिवादन. मीलों लम्बे सफ़र लांघकर उम्र हँसी हों मन दर्पण में प्रेम की पराकाष्ठा का ऐसा मनोहारी चित्रण की जो पढ़े आपकी इस कविता से प्यार हो जाये , किसी खाश अपने को दीजिये निश्चय ही गहरी चाप छोड़ेगा

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्यवाद! चन्दन जी.सराहना के लिए आभार

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 19, 2012

आदरणीय राजीव जी, सादर अभिवादन. नदिया की लहरों से पुलकित साँझ ढले तुम आए लगा कि मौसम ने खुशबू के छंद नए गाए. सारी की सारी कविता भाव से भरी. किस पारा को चुने कठिन है. क्या निवेदन है. बहुत बहुत बधाई. इन प्रणय के कोरे कागज पर कुछ शब्द ढले नयनों से आहत मोती के मनकों को चुग डालो प्रिय अंखियों से

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्यवाद! आदरणीय प्रदीप जी.सराहना के लिए आभार.आपका आशिर्वाद मिला,काफी प्रसन्नता हुई.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 19, 2012

आदरणीय राजीव जी, सादर अभिवादन. नदिया की लहरों से पुलकित साँझ ढले तुम आए लगा कि मौसम ने खुशबू के छंद नए गाए. सारी की सारी कविता भाव से भरी. किइन प्रणय के कोरे कागज पर कुछ शब्द ढले नयनों से आहत मोती के मनकों को चुग डालो प्रिय अंखियों सेसे पारा को चुने कठिन है. क्या निवेदन है. बहुत बहुत बधाई.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    March 22, 2012

    धन्यवाद! आदरणीय प्रदीप जी.सराहना के लिए आभार.आपका आशिर्वाद मिला,काफी प्रसन्नता हुई. आभार सहित, …राजीव

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
March 22, 2012

धन्यवाद ! आदरणीया निशा जी.आप सबों की सराहना उत्साहवर्धन का काम करती हैं. आभार सहित, …राजीव


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