कहना है

कई बार बहुत कुछ कहने का मन करता है.लेकिन शब्द नहीं मिलते.कागज कोरे ही रह जाते हैं.शब्द जब लेखनी के रूप में ढलता है तो इस ब्लॉग के रूप में प्रकट होता है.

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कितना अच्छा लगता है

Posted On: 9 Apr, 2012 में

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Kitna Achcha Lagta hai

    कितना अच्छा लगता है
    यूँ अनायास मिलना
    दुनियाँ के गलियारों में
    साथ-साथ फिरना


अभी छू गई है
पुरवाई गालों को
दे गया चुनौती कौन
दर्द के उबालों को

    दहलीज को चूम रहे
    आँगन अमलतास के
    उधेड़ दो न अब घूंघट
    क्षणजीवी प्यास के


कितनी भारी है
आँखों का सूनापन
सोया सा लगता है
सांसों का सूनापन

    मन से टकराता है
    ऐसे सन्नाटा
    कंठ में चुभे जैसे
    सेही का कांटा


पोर पोर में सरसों फूली
आँखें रसमसाती
मधु अतीत की सुगंध पीकर
पांखें कसमसाती

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 12, 2012

आदरणीय झा साहब, नमस्कार. आपकी कविताओं को पढ़ने का एक अलग ही आनंद है. आभार……

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 12, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! अजय जी.सराहना के लिए आभार.

vikramjitsingh के द्वारा
April 11, 2012

राजीव जी सादर, बहुत अच्छी और मनमोहक रचना है, आपकी, देरी से कमेन्ट देने के लिए क्षमा चाहते हैं,….कुछ काम ही ऐसा था, मंच पर हाजरी नहीं लगा सके.. उम्मीद है आप अन्यथा नहीं लेंगे……

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 12, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! विक्रम जी.कई बार पोस्ट जे.जे. के मुख पृष्ठ पर दिखाई नहीं देती इसलिए पता नहीं चल पाता,ऐसा मेरे साथ भी होता है.वैसे आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार अवश्य था,क्योंकि आपकी प्रतिक्रिया अलग अंदाज में होती हैं.इस बार आपने कोई शेर नहीं कहा,इसलिए थोड़ा निराश हूँ.सराहना के लिए आभार.

मनु (tosi) के द्वारा
April 11, 2012

आदरणीय राजीव जी , सादर नमस्कार ! जिस दिन आपने ये कविता पोस्ट की उसी दिन अपनी प्रतिक्रिया देना चाहती थी पर नेट की गड़बड़ी …….. आपकी रचना दिल को छू लेने वाली है पोर पोर में सरसों फूली आँखें रसमसाती मधु अतीत की सुगंध पीकर पांखें कसमसाती… बहुत खूब !

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 12, 2012

    सादर नमस्कार एवं धन्यवाद ! मनु जी.बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर आना हुआ,अच्छा लगा.सराहना के लिए आभार.

akraktale के द्वारा
April 11, 2012

राजीव जी सादर नमस्कार, मन से टकराता है ऐसे सन्नाटा कंठ में चुभे जैसे सेही का कांटा पूर्ण मनोयोग से लिखी सुन्दर रचना. बधाई.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 11, 2012

    धन्यवाद ! आदरणीय अशोक जी. सराहना के लिए आभार.

jlsingh के द्वारा
April 11, 2012

झा जी, नमस्कार! अच्छा समां बांध दिया आपने! पोर पोर में सरसों फूली आँखें रसमसाती मधु अतीत की सुगंध पीकर पांखें कसमसाती

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 11, 2012

    आदरणीय जवाहर जी.धन्यवाद! सराहना के लिए आभार. आप सबों के स्नेह का ही प्रतिफल है.

shashibhushan1959 के द्वारा
April 10, 2012

आदरणीय झा जी, सादर ! क्या बात है ! आपने तो शमा बाँध दिया ! शब्द न्यूनतम, भाव अधिकतम ! बहुत सुन्दर, बहुत दिलकश ! बधाई !!!!!

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 11, 2012

    धन्यवाद ! आदरणीय शशि जी.सराहना के लिए आभार. काफी दिनों बाद ब्लॉग पर आपके आने पर सुखद अहसास हुआ.

ANAND PRAVIN के द्वारा
April 9, 2012

आदरणीय राजीव सर, सादर प्रणाम सुन्दर और शीतल रचना आपकी………………दिल को भाति हुई

    April 10, 2012

    सादर प्रणाम! शीतल और सुगन्धित हवा के झोके जैसी रचना के लिए ……बधाई और हार्दिक आभार.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 10, 2012

    प्रिय आनंद जी, धन्यवाद ! मंच पर एवं ब्लॉग पर पुनः वापसी पर स्वागत है.सराहना के लिए आभार.

Rajkamal Sharma के द्वारा
April 9, 2012

आदरणीय राजीव जी …… सादर अभिवादन ! इसे कहते है कविता WELL DONE – डन डना डन :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 10, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! आदरणीय राजकमल जी.सराहना के लिए आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 9, 2012

अभी छू गई है पुरवाई गालों को दे गया चुनौती कौन दर्द के उबालों को आदरणीय राजीव जी, सादर अभिवादन. सुन्दर भाव के साथ सुन्दर प्रस्तुति. बधाई.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 10, 2012

    धन्यवाद ! आदरणीय प्रदीप जी.सराहना के लिए आभार.आपका स्नेह यूँ ही बरसता रहे.

dineshaastik के द्वारा
April 9, 2012

सुन्दर भावों को अभिव्यक्त करती हुई सराहनीय  रचना….

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 10, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद दिनेश जी.सराहना के लिए आभार.

nishamittal के द्वारा
April 9, 2012

सुन्दर भाव और प्रस्तुतीकरण पर बधाई राजीव जी.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 10, 2012

    धन्यवाद ! आदरणीया निशा जी.सराहना के लिए आभार.

yogi sarswat के द्वारा
April 9, 2012

पोर पोर में सरसों फूली आँखें रसमसाती मधु अतीत की सुगंध पीकर पांखें कसमसाती shri rajeev kumar jha ji , namaskar ! anandit ho gaya man ! bahut sundar panktiyan ! bahut sundar bhaav ! ahaa

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 10, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद योगी जी.सराहना के लिए आभार.आप सबों ने इतना स्नेह दिया है कि क्या कहूं.

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 9, 2012

पोर पोर में सरसों फूली आँखें रसमसाती मधु अतीत की सुगंध पीकर पांखें कसमसाती …. सर नमस्कार ..आपकी कवितायेँ अलग सी होती है…पढ़ कर आनंद आता है…बहुत सुंदर प्रस्तुति…..

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 10, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद महिमा जी.सराहना के लिए आभार.कविता पसंद आई,यह जानकर अच्छा लगा.

चन्दन राय के द्वारा
April 9, 2012

राजीव जी , प्रकृति और प्रेम की सुन्दरता का सम्मिश्रण करते हुए प्रेम के सुंदर अनमोल पालो का श्रृंगार मजा आ गया गुरु जी , और बरसते रहे ऐसे ही भाव यही है अनुग्रह

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 10, 2012

    धन्यवाद ! चन्दन जी.सराहना के लिए आभार.कविता अच्छी लगी,जानकर सुखद अहसास हुआ.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
April 10, 2012

नमस्कार एवं धन्यवाद! प्रिय अनिल जी. सराहना के लिए आभार.


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