कहना है

कई बार बहुत कुछ कहने का मन करता है.लेकिन शब्द नहीं मिलते.कागज कोरे ही रह जाते हैं.शब्द जब लेखनी के रूप में ढलता है तो इस ब्लॉग के रूप में प्रकट होता है.

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कहना है तुमसे

Posted On: 22 May, 2012 में

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Eyes

नयन खुले अधखुले

सहमी सहमी है हवाएं

पलकों पर बोझिल

बेरहमी सपनों की


लहरे लहरे केशों की

बिखरी परिभाषा

अधरों पर सुर्ख हो रही

अतृप्त मन की आशा


कहना है कुछ सुनना है कुछ

आई है बारी

हवा कुंवारी सौन्दर्य पर्व की

ठहर गई मतवारी

उठा नहीं पाते जो

झुकाते हैं पलकें

मिला नहीं पाते हैं अब

अपने आप से ही नजरें

बंधते जा रहे हैं

मेरे ही अल्फाजों में

सिमटते जा रहे हैं

मेरे ही अहसासों में


दूर क्षितिज नीलांचल फैला

अपनी बांह पसारे

जीवन नौका पर बैठे हैं

मंजिल हमें निहारे


कितने ही तूफ़ान घिरे

पर कभी न हिम्मत हारा

अरूणिम संध्या और उषा से

संगम हुआ हमारा

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51 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
May 27, 2012

कितने ही तूफ़ान घिरे पर कभी न हिम्मत हारा अरूणिम संध्या और उषा से संगम हुआ हमारा बहुत ही सुन्दर और उत्प्रेरक पंक्तियाँ!

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    धन्यवाद ! आदरणीय जवाहर जी.सराहना के लिए आभार.

May 26, 2012

मुझे मत मरो मेरा क्या कसूर है………. http://satyaprakash.jagranjunction.com/2012/05/25/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B8/#comment-१२ किसी भी धर्म के लोग हो उन्‍हे आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए और सरकार से भी निवेदन करना चाहिए कि इस तरह के कार्यक्रमो पर रोक लगायी जाय, मै आप सभी का आग्रह करना चाहता हुँ कि आप निम्‍न माबाईल न0 फोन कर इसे राकने का आग्रह करे जिलाधिकारी गोरखपुर 9454417544 आयुक्‍त गोरखपुर 9454417500 एस एस पी गोरखपुर 945440273 आई जी गोरखपुर 9454400209 एस पी आरए 9454401015 योगी आदित्‍यनाथ सांसद गोरखपुर 0551-2255454, 53

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    धन्यवाद ! अनिल जी.

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 25, 2012

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है पेज 40-41 में .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 27, 2012

    जानकारी के लिए धन्यवाद! महिमा जी.

yamunapathak के द्वारा
May 24, 2012

bahut sundar panktiyaan hain

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद यमुना जी.सराहना के लिए आभार.

rekhafbd के द्वारा
May 23, 2012

राजीव जी ,सुंदर भाव ,बधाई

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद रेखा जी.सराहना के लिए आभार.

vikramjitsingh के द्वारा
May 23, 2012

आदरणीय राजीव जी… सादर नमस्कार…. ”सौ बार मरना चाहा…नज़रों में डूब कर…. वो पलकें झुका लेते हैं….हमें मरने नहीं देते…” सादर……

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद विक्रम जी.सराहना के लिए आभार. आपके तरकश के इन्हीं तीरों के हम कायल हैं ऊपर दिखते भले चंगे पर अन्दर से घायल हैं.

yogi sarswat के द्वारा
May 23, 2012

राजीव जी सादर नमस्कार, कितने ही तूफ़ान घिरे पर कभी न हिम्मत हारा अरूणिम संध्या और उषा से संगम हुआ हमारा आत्मबल को बढ़ाती सुन्दर रचना

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद योगी जी.सराहना के लिए आभार.

मनु (tosi) के द्वारा
May 23, 2012

आदरणीय ,(सर)राजीव जी …. बेहद उम्दा ,सभी पंक्तीय बढ़िया कितने ही तूफ़ान घिरे पर कभी न हिम्मत हारा अरूणिम संध्या और उषा से संगम हुआ हमारा… वाह !

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    मनु जी,नमस्कार.सराहना के लिए आभार.

sinsera के द्वारा
May 23, 2012

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

    follyofawiseman के द्वारा
    May 23, 2012

    अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी, ‘अपनी डफली अपना राग’ ………..मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है………. अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा……अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा…….आत्मवान व्यक्ति respond करता है…..तीन दिन बाद react नहीं……..और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो….मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको……चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का….. इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है…..आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है….. इस सब के आलवे……न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है……..स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है……हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है…….और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो…… “इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…” जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है……ये किसी और लोक की बात नहीं है……….. आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें….की बिना रावण के राम का होना असंभव है…….आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं……ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए…….जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा………. ” इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ” क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा…..अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल……….और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है………..तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है………..क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा……..मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है………ये भिखमंगापन त्यागिए………! और अंत मे यही कहूँगा….कि , ’जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा….. और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है…………मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा………” (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो…….मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है………) एक और बात ज़रा मुझे बताइए….जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी……? व्यक्ति का अस्तित्व होता है…समाज का नहीं…..मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे……????

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 22, 2012

आदरणीय राजेव सर, सादर प्रणाम काफी दिनों बाद आपकी पोस्ट आई पढ़ कर अच्छा लगा इस बार काफी जुदा रंग आपने रखा है अपनी कविता में ………….बहुत ही मधुर और सीतल प्यार …………सुन्दर कृति के लिए आपको बधाई सर

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    धन्यवाद ! प्रिय आनंद जी. सराहना के लिए आभार.इस कविता में कुछ जुदा रंग दिखा,यह जानकर प्रसन्नता हुई.

sinsera के द्वारा
May 22, 2012

आदरणीय राजीव जी, नमस्कार, आप बिना सूचना के पूरे 31 दिन की छुट्टी के बाद वापस आये हैं… पर रचना शानदार लाये हैं… बंधते जा रहे हैं मेरे ही अल्फाजों में सिमटते जा रहे हैं मेरे ही अहसासों में…. ख़ूबसूरत………… लेकिन मर्लिन मनरो की फोटो तो किसी और पोज़ में मशहूर है…….

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद सरिता जी.सराहना के लिए आभार.आपका संकेत मैं समझ गया.लेकिन यह फोटो मर्लिन मुनरो की नहीं बल्कि सोफिया लॉरेन की है.कुछ दिनों के लिए मंच से ब्रेक लिया था.मौर्निंग क्लासेज के लिए सुबह सुबह कौलेज एवं दोपहर में वापसी काफी थका देने वाला था.इसके बाद कुछ कर पाने की इच्छा नहीं रह जाती थी.अब तो गरमी की छुट्टियाँ हो चुकी हैं,एक महीने के लिए,यूनिवर्सिटी के द्वारा.

rajkamal के द्वारा
May 22, 2012

आदरणीय राजीव जी ….. सादर प्रणाम ! रचना तो आपकी निराली है और चित्र उससे भी कहीं ज्यादा निराला लेकिन अगर मधुबाला होती तो क्या बात होती ! अच्छी रचना पर मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद आदरणीय राजकमल जी.सराहना के लिए आभार.इस पोस्ट के लिए मैं केट विंसलेट या मधुबाला की फोटो चुनना चाहता था,लेकिन रचना के भाव के उपुक्त कोई फोटो नहीं मिली.अनायास ही सोफिया लॉरेन की यह फोटो दिख गई जो इस पोस्ट के उपयुक्त लगी.फिर भी आपकी पसंदीदा अभिनेत्री मधुबाला की फोटो अगले पोस्ट में जरूर दिखेगी.

div81 के द्वारा
May 22, 2012

आदरनीय राजिव जी, सादर नमस्कार भावनाओं से सजी सुन्दर रचना ……………………… बधाई

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! दिव्या जी.सराहना के लिए आभार.

akraktale के द्वारा
May 22, 2012

राजीव जी सादर नमस्कार, कितने ही तूफ़ान घिरे पर कभी न हिम्मत हारा अरूणिम संध्या और उषा से संगम हुआ हमारा आत्मबल को बढ़ाती सुन्दर रचना. बधाई.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! आदरणीय अशोक जी.सराहना के लिए आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 22, 2012

आदरणीय राजीव जी, सादर अभिवादन इतने दिन कहाँ रहे झील सी गहरी आँखों के पलकों के किनारे बैठे थे डूबना उनकी मंजिल थी हम किश्ती लगाये बैठे थे नाजुक नाजुक लव उसके रेशम सी जुल्फें शाने पे निगेहबान सी लटकती हैं कैसे करूँ दीदार उनका नागिन बन मुझे डसती हैं आ पंहुचा उस मुकाम पे अब धरा गगन जैसे मिलते हैं इस जनम तो उसको पा न सका अगले जनम में फिर मिलते हैं. है प्यार मेरा तेरे ही लिए दूजा कोई क्यों पायेगा चाहत रहे दिल की दिल में प्यार अमर हो जायेगा बधाई

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी,सादर. प्रतिक्रियास्वरूप बहुत अच्छी कविता भेंट की है.कुछ दिनों के लिए मंच से ब्रेक लिया था.मौर्निंग क्लासेज के लिए सुबह सुबह कौलेज एवं दोपहर में वापसी काफी थका देने वाला था.इसके बाद कुछ कर पाने की इच्छा नहीं रह जाती थी.अब तो गरमी की छुट्टियाँ हो चुकी हैं,एक महीने के लिए,यूनिवर्सिटी के द्वारा.

Mohinder Kumar के द्वारा
May 22, 2012

राजीव जी, मर्लिन मुनरो की तस्वीर और रचना के भाव दोनों ही बहुत सुन्दर हैं.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! मोहिंदर जी.ब्लॉग पर आपका स्वागत है.आपकी प्रथम प्रतिक्रिया एवं सराहना के लिए आभार.रचना के भाव एवं फोटो अच्छे लगे,यह जानकर अच्छा लगा.यह फोटो मर्लिन मुनरो की नहीं बल्कि सोफिया लॉरेन की है.

omdikshit के द्वारा
May 22, 2012

झा जी, नमस्कार. यदि हिम्मत हार ,जाते तो न उषा मिलती और न हि संध्या.धैर्य जरूरी है.लेकिन …यह तस्वीर तो …किसी और की लगती है.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! आदरणीय ओम जी.आपने सही कहा,धैर्य बहुत जरूरी है.यह फोटो सोफिया लॉरेन की है.

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 22, 2012

दूर क्षितिज नीलांचल फैला अपनी बांह पसारे जीवन नौका पर बैठे हैं मंजिल हमें निहारे आदरणीय राजीव सर … बहुत दिनों बाद …. सुंदर अभिवयक्ति के साथ .. बधाई स्वीकार करें

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    महिमा जी,धन्यवाद ! भावाभिव्यक्ति सफल हुई,यह जानकार अच्छा लगा.सराहना के लिए आभार.

minujha के द्वारा
May 22, 2012

राजीव जी बहुत   दिनों बाद आपकी  ये रचना आई  है ,बहुत  ही सुंदर उदगार भावनाओं का,बधाई

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    मीनू जी,धन्यवाद ! रचना की सराहना के लिए आभार.

mparveen के द्वारा
May 22, 2012

झा जी नमस्कार, बहुत सुंदर भावों से युक्त रचना के लिए आपको ढेरों बधाई !!!

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! प्रवीण जी.सराहना के लिए आभार.

dineshaastik के द्वारा
May 22, 2012

दूर क्षितिज नीलांचल फैला अपनी बांह पसारे जीवन नौका पर बैठे हैं मंजिल हमें निहारे आदरणीय राजीव जी, बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति, बधाई….

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! आदरणीय दिनेश जी.सराहना के लिए आभार.

चन्दन राय के द्वारा
May 22, 2012

झा साहब , दूर क्षितिज नीलांचल फैला अपनी बांह पसारे जीवन नौका पर बैठे हैं मंजिल हमें निहारे सुन्दर भाव से परिपूर्ण

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    धन्यवाद! चन्दन जी.सराहना के लिए आभार.

nishamittal के द्वारा
May 22, 2012

राजीव जी बहुत दिन पश्चात सुन्दर भावपूर्ण रचना बहुत अच्छी लगी,

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    आदरणीया निशा जी,धन्यवाद ! सराहना के लिए आभार.

May 22, 2012

सादर प्रणाम! दूर क्षितिज नीलांचल फैला अपनी बांह पसारे जीवन नौका पर बैठे हैं मंजिल हमें निहारे………..आके इनकी प्यास बुझा जा, प्यासे नयना तुझे पुकारे…….!

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    धन्यवाद! अनिल जी.सराहना के लिए आभार.

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 22, 2012

आदरणीय झा साहब नमस्कार ! बहुत ही सुन्दर भाव-पूर्ण रचना….. आभार !

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 24, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद! अजय जी.सराहना के लिए आभार.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
May 28, 2012

धन्यवाद ! आदरणीय जवाहर जी.आपके आशीर्वाद एवं सराहना के लिए आभार.


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