RAJEEV KUMAR JHA

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कौड़ी के मोल

Posted On: 28 May, 2012 Others में

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koudi1

प्रायः हम बोलचाल में कौड़ी से संबंधित मुहावरे का प्रयोग करते हैं.जैसे-’दो कौड़ी का आदमी’ या ‘कौड़ियों के मोल’ आदि..

दूर दराज के इलाकों में आज भी कौड़ियों का मुद्रा के रूप में चलन दिख जाता है.कौड़ी एक मजबूत मुद्रा है.इसका सबसे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि कौड़ी के स्थान पर जब धातु के सिक्के चले तो कौड़ी का अस्तित्व समाप्त नहीं हो गया बल्कि उसके साथ-साथ चलता रहा.१९३० तक दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों में एक पैसा सोलह कौड़ियों के बराबर था.बंगाल में एक रुपया ३८४० कौड़ियों के बराबर होता था.आज से तीन चार दशक पूर्व ६४ कौड़ियाँ एक पैसे के बराबर होती थी.बर्मा में ६४०० कौड़ियाँ एक टिक्कल के बराबर होती थी.चीन में धातु के सिक्के कौड़ी की शक्ल के बनते थे.१३वी शताब्दी में मार्कोपोलो ने चीन के उन्नन में ऎसी ही कौड़ियों का चलन पाया था.जिस प्रकार धातु की मुद्रा में उतार चढ़ाव आता है ,उसी प्रकार कौड़ी की मुद्रा में भी उतार चढ़ाव आता था और व्यापारी इसका पूरा पूरा लाभ उठाते थे.व्यापारी प्रशांत महासागर के टापुओं से सस्ती दरों पर कौड़ियाँ खरीदते और अफ्रीका में जाकर महंगे दाम में बेचते थे.

कौड़ी को ही मुद्रा के रूप में क्यों चुना गया,शायद इसकी वजह यह है की कौड़ी में वे सारे गुण विद्यमान हैं, जो एक अच्छी मुद्रा में होने चाहिए.इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है.ये नष्ट नहीं होती.गिनने में आसानी रहती है.कोई नकली कौड़ी नहीं बना सकता.फिर कौड़ी अपनी एक खास पहचान भी रखती है.

लेकिन सब प्रकार की कौड़ियों का प्रयोग मुद्रा के रूप में नहीं किया जाता.विशेषज्ञों के अनुसार विश्व में १६५ किस्म की कौड़ियाँ मौजूद हैं.उनमें से केवल दो प्रकार की कौड़ियाँ ही मुद्रा के रूप में चलती थीं.पहली मनी कौड़ी(साइप्रिया मोनेटा) और दूसरी रिंग कौड़ी(साइप्रिया अनेलस).ये दोनों प्रकार की कौड़ियाँ छोटी हैं,चिकनी हैं और उनके किनारे मोटे हैं.मनी कौड़ी पीली या हलके पीले रंग की होती हैं.लम्बाई लगभग एक इंच के बराबर होती है.भारत एवं एशिया के कुछ भागों में इन्हीं कौड़ियों का चलन था.रिंग कौड़ी का रंग ज्यादा सफ़ेद नहीं होता.इसकी पीठ पर नारंगी रंग का गोला होता है.इसी कारण इसका नाम रिंग कौड़ी पड़ा.इस रिंग कौड़ी का चलन एशियाटिक द्वीप में अधिक था.

अफ्रीका में दोनों प्रकार की कौड़ियों का चलन था.आज भी अफ्रीका के कुछ भागों में कौड़ी की मुद्रा मौजूद है.अफ्रीका में कौड़ियों का चलन सबसे पहले अरबी व्यापारियों ने फैलाया.बाद में यूरोप के व्यापारियों ने इसका लाभ उठाया.डच,पुर्तगीज,फ्रेंच एवं अंग्रेजों ने अफ्रीका में टनों कौड़ियों का आयात कराया.वे इन कौड़ियों से गुलामों की खरीद करते थे.इसके अतिरिक्त हाथी दांत एवं गोले का तेल भी इन्ही कौड़ियों से खरीदा जाता था.सारा व्यापर पहले समुद्र तट तक सीमित था,लेकिन धीरे-धीरे व्यापारी अंदरूनी भाग में भी पहुँच गए और व्यापारियों के साथ कौड़ियाँ भी.अफ्रीका के ईव जनजाति के लोग मुर्दों को कौड़ियों से भी ढंकते थे ,ताकि अगर मृतक पर किसी का कर्ज हो तो वह उन कौड़ियों में से उठाकर वसूल कर लें.

मनी कौड़ी और रिंग कौड़ी प्रशांत महासागर के गरम एवं छिछले क्षेत्र में बहुतायत से पायी जाती हैं.मालदीव तो कौड़ियाँ का द्वीप ही कहलाता था.नवीं शताब्दी में सुलेमान नामक अरबी व्यापारी और दसवीं में बगदाद के एक मसूदी ने कौड़ियों को इकठ्ठा करने का बड़ा दिलचस्प वर्णन किया है.उनके अनुसार नारियल के पत्तों से कौड़ियाँ इकठ्ठा की जाती थीं.विश्व भर के व्यापारी यहाँ आते और माल के बदले कौड़ियाँ ले जाते.एक अनुमान के अनुसार यहाँ से हर वर्ष तीस-चालीस जहाज कौड़ियों में भरकर ले जाते थे.

यदि मालदीव कौड़ियों को इकठ्ठा करने का केंद्र था तो भारत उनके वितरण का केंद्र था.ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ज़माने में भारत में हर वर्ष चालीस हजार पौंड के मूल्य की कौड़ियों का आयात किया जाता था.आज भारत में कौड़ियों का चलन नहीं रहा लेकिन आज भी वह समृद्धि एवं लक्ष्मी का प्रतीक बन कर लोगों के ह्रदय में प्रतिष्ठित है.जब जब लक्ष्मी की पूजा होती है,कौड़ी सामने अवश्य होती है.बंगाल में लक्ष्मी पूजा के अवसर पर एक ऎसी टोकरी को पूजा जाता है जो सब और से कौड़ियों से सजी होती है. इस टोकरी में माला,धागा,कंघा,शीशा,सिन्दूर, लोहे का कड़ा और न जाने क्या होता है.इस टोकरी को ‘लोखी झापा’ या ‘लक्ष्मी की टोकरी’ कहते हैं.

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में एक मंदिर ऐसा भी है जहां प्रसाद के रूप में कौड़ी चढती है और कौड़ी ही मिलती है। इसे कौड़ी माता का मन्दिर कहा जाता है। यही नहीं कौड़ी माता का स्नान भी कौड़ी से ही कराया जाता है। अगर उन्हें प्रसन्न करना है तो रुपयों से कौडी खरीदें और उनके चरणों में समर्पित करके आर्शीवाद के भागी बनें।

मंदिर में ही स्थित एक छोटी सी दुकान से ही श्रद्धालु कौड़ी खरीद सकते हैं। पास ही में स्थित दुर्गा, मानस त्रिदेव एवं संकट मोचन मंदिरों में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ रहती है लेकिन यहां पर काफी शान्ति दिखाई देती है। इक्‍का-दुक्‍का लोग ही यहां दर्शन करने के लिए आते हैं।

चूंकि यह दक्षिण की देवी है इसलिए दक्षिण भारत से आनेवाले श्रद्धालु ही ज्यादातर यहां पर दर्शन के लिए आते हैं। बाहरी दर्शनार्थी कौड़ी लेकर आते हैंऔर चढ़ाते हैं बदले में प्रसाद स्वरूप उन्हें एक कौड़ी दी जाती है जिसे श्रद्धालु सुख समृद्धि का प्रतीक मानकर अपने घर के पूजा के स्थान पर रखते हैं। कौड़ी माता तमिल भाषा में माता सोइउम्मा तथा तेलगू में गवल अम्मा के नाम से जानी जाती है।

दीपावली के अवसर पर कौड़ी को किसी एक दीपक के तेल में डुबा दिया जाता है.दीपक जलता रहता है.सावधानी इस बात की बरती जाती है कि उस कौड़ी को कोई न ले जाये.ऐसा समझा जाता है कि जो उस कौड़ी को जेब में रख कर जुआ खेलने जाता है,वह जीत कर लौटता है.दशहरा के अवसर पर कन्याएं अपने घर के दरवाजे के पास गोबर से देवी की प्रतिमा बनाती है,और उसे कौड़ियों से सजाती है.गोवर्द्धन पूजा के अवसर पर भी गोबर से गोवर्द्धन की जो मूर्ति बनाई जाती है,उसे भी कौड़ियों से सजाया जाता है.

विवाह के अवसर पर भी कौड़ी को महत्वपूर्ण माना जाता है.वर-वधु के कंकण में कौड़ी बांधी जाती है.मंडप के नीचे जिस पट्टे पर वर-वधु बैठते हैं,उस पर भी कौड़ी बांधी जाती है.मंडप के नीचे कलश में अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त कौड़ी भी डाली जातीहै.इस देश के हर प्रान्त में कौड़ी का प्रयोग अलग-अलग तरीके से होता है.ओड़िसा में विवाह के अवसर पर वधु के माता-पिता वधु को एक टोकरी भेंट करते हैं जिसे ‘जगथी पेडी’कहते हैं.इस टोकरी में रोजमर्रा के काम आने वाली हरेक वस्तु होती है,जिसमें कौड़ी जरूर होती है.आंध्र प्रदेश में भी यही रिवाज है.वहां इस टोकरी को ‘कविडा पेटटे’ कहा जाता है.

कौड़ी हमारे जीवन के प्रत्येक कार्यकलाप से जुड़ी हुई है.मनुष्य इसकी पूजा करता है,तो इससे श्रृंगार भी करता है. इससे जुआ खेलता है तो इससे औषधि भी बनाता है.

इस बात के प्रमाण हैं कि आदि काल में भी कौड़ी बेहद मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण थी और लोग इसे सहेज कर रखते थे.विश्व भर में जहाँ-जहाँ भी ऐतिहासिक खुदाइयां हुई हैं,वहां कौड़ी अवश्य मिली हैं.

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46 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मनु (tosi) के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय राजीव जी ,सादर !!  कौड़ी का इतिहास आज जानने का मौका आपकी वजह से मिला धन्यवाद !!!

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 19, 2012

    मनु जी,धन्यवाद ! कौड़ी के सम्बन्ध में आलेख पसंद आया,यह जानकर खुशी हुई.आगे भी अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करते रहिएगा.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    बहुत-बहुत धन्यवाद ! साईट पर जाकर देखा,बहुत अच्छा लगा.अजय जी आपका आभार.इसी तरह पटरी पर रेल निर्बाध रूप से दौड्ती रहे.

nishamittal के द्वारा
May 29, 2012

कौड़ी ka इतिहास और विशिष्ठ जानकारी देने के लिए धन्यवाद झा जी.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    धन्यवाद ! आदरणीया निशा जी.सराहना के लिए आभार.

alkargupta1 के द्वारा
May 29, 2012

राजीव जी, कौड़ी के बारे में वृहद जानकारी प्रदत्त अति उत्तम आलेख

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    आदरणीया अलका जी, धन्यवाद ! सराहना के किये आभार.

satish3840 के द्वारा
May 29, 2012

झा साहब नमस्कार / कौड़ी के बारे में आपने अपनी जानकारी हमसे शेयर करके बड़े ही दूर की कौड़ी फेंकी हें / बहुत ही सरल व् अच्छी जानकारी

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! आदरणीय सतीश जी.सराहना के लिए आभार.

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
May 29, 2012

आदरणीय झा जी नमस्कार आपने इस लेख में माध्यम से बहुत ही रोचक जानकारी उपलब्ध कराई है. ज्ञानवर्धन हेतु हार्दिक आभार

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! अजय जी.सराहना के लिए आभार.

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 28, 2012

आदरणीय राजीव सर, सादर प्रणाम कौड़ी पर इतनी विस्तृत लेख पढ़ आनंद भी आया और रोमांच भी अब किसी को दो कौड़ी का आदमी कहलाने में शर्म नहीं आनी चाहिए बहुत ही जानकारी युक्त लेख आपका सर …………हमें आपके इस लेख के लिए आपको धन्यवाद कहना चाहिए

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    प्रिय आनंद जी,धन्यवाद ! कौड़ी से सम्बंधित इतने मुहावरे प्रचलित हैं कि आज यह जानकार रोमांच एवं आश्चर्य होता है कि कभी कौड़ी मुद्रा के रूप में प्रचलित थी.गांवों,घरों में आज भी लोगों के पास कौड़ी का संग्रह मिल जाता है.आलेख की सराहना के लिए आभार.

akraktale के द्वारा
May 28, 2012

राजीव जी सादर नमस्कार, कौड़ियों पर इतनी विस्तृत जानकारी पहली बार ही मिली हैं.बहुत ही रोचक आलेख. साधुवाद.

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    May 28, 2012

    आदरणीय राजीव जी ….. सादर अभिवादन ! आप कोड़ीया नहीं बल्कि अनमोल मोती ढूंड कर लाये है हम सभी के लिए ….. वैसे दो कोड़ी की इज्जत भी होती है –हा हा हा हा मैं आदरणीय अशोक जी की बात से सहमत हूँ की पहली बार इस दो टके की कौड़ी पर इतनी मुक्य्वान और उपयोगी जानकारी आपके प्रयासों से मिल पाई है ….. जय श्री कृष्ण जी :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    jlsingh के द्वारा
    May 30, 2012

    सचमुच झा जी, अभिवादन के साथ आभार भी इतनी बेहतरीन जानकारी उपलब्ध कराई!

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! आदरणीय अशोक जी.सराहना के लिए आपका आभार.

चन्दन राय के द्वारा
May 28, 2012

राजीव साहब , आपने तो कोडी को फिर से अनमोल बना दिया , आज जो कोडी मुहावरों में जिन्दा रह गई थी , आप ने उसे उसकी कीमत फिर से दिला दी , और मेरे लिए तो जानकारी का सागर है आपका आलेख

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    चन्दन जी,धन्यवाद ! यह सही है कि कौड़ी से सम्बंधित अनेक मुहावरे प्रचलित हैं.आलेख की सराहना के लिए आभार.

अजय कुमार झा के द्वारा
May 28, 2012

आह कौडियों की ये पोस्ट मेरे लिए तो अनमोल रही मित्र । बिहार में एक प्रथा है जब नई बहुरिया गौना करके आती है तो अब भी देवर के साथ कौडी खेलती है । बडा ही रोचक लगता है । आज के लोगों ने तो शायद कौडियों की शक्ल भी नहीं देखी होगी । बहुत ही उम्दा पोस्ट

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! अजय जी.ब्लॉग पर आपका स्वागत है.आपकी प्रथम प्रतिक्रिया के लिए आभार.आपने बिलकुल सही कहा है,यह प्रथा आज भी हमारे गाँव घरों में प्रचलित है.बचपन में तो हमलोग कौड़ियों के साथ खूब खेला करते थे.गाँव घरों के पक्के मकानों में फर्श पर बने चौसर के खानों को भी देखा है,जिस पर महिलाएं कौड़ी से चौसर खेला करती थीं.आलेख की प्रशंसा के लिए पुनः आभार.उम्मीद है,आगे भी आपकी प्रतिक्रियाएं मिलती रहेंगी.

vikramjitsingh के द्वारा
May 28, 2012

आदरणीय राजीव जी….सादर…. पहली बार इतनी जानकारी मिली कौड़ियों के बारे में…. धन्यवाद.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! विक्रम जी.सराहना के लिए आभार.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 28, 2012

श्रद्धेय राजीव कुमार झा जी, साभिवादन ! अरसा बाद आप दिखे साथ ही दुर्लभ विषय -वस्तु की ढेर सारी जानकारियाँ भी अपने साथ लेते आये | हार्दिक आभार ! पुनश्च !

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    आचार्य विजय जी ,सादर अभिवादन! व्यक्तिगत अनुभवों के साथ कुछ जानकारियों को साझा करने से विषय-वस्तु की नवीनता बनी रहे,प्रयास यही होता है. सराहना के लिए आभार.

May 28, 2012

सादर प्रणाम! “कौड़ी हमारे जीवन के प्रत्येक कार्यकलाप से जुड़ी हुई है.मनुष्य इसकी पूजा करता है,तो इससे श्रृंगार भी करता है. इससे जुआ खेलता है तो इससे औषधि भी बनाता है.” ज्ञान वर्धक आलेख के लिए …….हार्दिक आभार……!

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    अनिल जी,धन्यवाद ! सराहना के लिए आभार.

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 28, 2012

आदरणीय राजीव सर , नमस्कार वाह बहुत ही सारगर्भित आलेख / आज आपने बिलकुल अपने प्राध्यापक वाला हुनर ले कर आ ये / बहुत ही रोचक और जानकारी से भरा लेख / आपको बहुत -२ बधाई ..

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! महिमा जी.आलेख अच्छा लगा,यह जानकर खुशी हुई. वैसे, मेरा प्राध्यापक वाला अंदाज भी दिखाई पड़ेगा,यह तो कभी सोचा न था. लेकिन मैं तो आप सबों से सीखता हूँ.कविता के कितने प्रकार एवं रूप होते हैं,यह तो आप से ही सीखा है.सराहना के लिए बहुत-बहुत आभार.

mparveen के द्वारा
May 28, 2012

झा जी नमस्कार, कोडियों पर रौशनी डालने के लिए और इतनी जानकारी देने के लिए धन्यवाद…

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! परवीन जी.सराहना के लिए आभार.

yogi sarswat के द्वारा
May 28, 2012

आदरणीय श्री राजीव झा जी , सादर नमस्कार ! एक बेहतरीन , जानकारी भरा लेख ! बहुत सटीक जानकारी ! यही तो एकमात्र फायदा है इस मंच पर आप जैसे गुणी लोगों के साथ जुड़े रहने का ! क्या बात बताई है , अनूठी , उत्कृष्ट ! जब कौड़ी को नकली नहीं बनाया जा सकता तो भारत सरकार को दोबारा मुद्रा के रूप में कौड़ी का प्रचालन क्यों नहीं शुरू कर देना चाहिए ?

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! योगी जी.आलेख की प्रस्तुति अच्छी लगी,यह जानकार अच्छा लगा.यह सही है कि कौड़ी को नकली नहीं बनाया जा सकता लेकिन केवल दो प्रकार की कौड़ी ही मुद्रा के रूप में प्रचलित रही है.बदलते समय के साथ सब कुछ बदल जाता है.मुद्रा के स्वरूप में भी व्यापक परिवर्तन हुआ है.अंग्रेजों के ज़माने के सिक्के,जिस पर महारानी विक्टोरिया का चित्र छपा होता था,आज भी लोगों के जेहन में हैं.इस विषय पर एक विस्तृत आलेख प्रस्तुत किया जा सकता है.हमें भी आपके आलेखों से काफी कुछ सीखने को मिलता है.सराहना के लिए आभार.

rekhafbd के द्वारा
May 28, 2012

राजिव जी ,कौड़ियों पर प्रकाश डालता हुआ अद्भुत लेख ,mera ज्ञान बढाने के लिए धन्यवाद ,बधाई

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! रेखा जी.आलेख की सराहना के लिए आभार.

Mohinder Kumar के द्वारा
May 28, 2012

झा जी, बहुत गहन मंथन कर दूर की कौडी लाये हैं आप… इस महत्वपूर्ण सूचना के लिये आभार.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 1, 2012

    आदरणीय मोहिंदर जी,सादर.सराहना के लिए आभार.

anoop pandey के द्वारा
May 28, 2012

आदरणीय राजीव जी………..उत्तम शोध के साथ लिखा गया लेख. आप निश्चय ही बधाई के पात्र हैं.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! अनूप जी.ब्लॉग पर आपका स्वागत है. आपकी प्रथम प्रतिक्रिया एवं सराहना के लिए आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 28, 2012

aadarniy rajiv ji, saadar अभिवादन पहली बार मुझे इतनी जानकारी प्राप्त हुई. धन्यवाद.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी,सादर अभिवादन.सराहना के लिए आभार.

dineshaastik के द्वारा
May 28, 2012

आदरणीय राजीव जी बहुत ही सटीक , ज्ञानवर्धक  एवं ऐतिहासिक  जानकारी देने के लिये हृदय से आभार एवं उन्नत  प्रस्तुति के लिये बधाई…….

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    May 31, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! आदरणीय दिनेश जी.पोस्ट पर आपकी प्रथम प्रतिक्रिया एवं सराहना के लिए आभार.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
May 31, 2012

नमस्कार एवं धन्यवाद ! आदरणीय राजकमल जी.कौड़ियों पर यह आलेख पसंद आया,यह जानकर अच्छा लगा. कौड़ियों के मुद्रा के रूप में प्रचलित रहने के कारण ही,शायद इसे लोगों के साथ सम्बन्ध जोड़ा गया होगा.मुद्रा के अवमूल्यन के कारण ही आज आदमी दो कौड़ी का हो गया,लगता है.वैसे यह सभी पर लागू नहीं होता है.जिस पर अपने मन का गुबार निकालना हो उस पर सोच समझकर ही प्रयोग किया जाना चाहिए. सराहना के लिए आपका आभार.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
May 31, 2012

आदरणीय जवाहर जी,सादर अभिवादन.सराहना के लिए आभार.


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