कहना है

कई बार बहुत कुछ कहने का मन करता है.लेकिन शब्द नहीं मिलते.कागज कोरे ही रह जाते हैं.शब्द जब लेखनी के रूप में ढलता है तो इस ब्लॉग के रूप में प्रकट होता है.

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जो न मिले सुर

Posted On: 4 Jun, 2012 Others में

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कई साल पहले दूरदर्शन पर एक संगीतमय विज्ञापन राष्ट्रीय एकता को प्रतिबिंबित करती नजर आती थी. ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’, अलग-अलग विधाओं के चर्चित चेहरे ,फनकार, विभिन्न प्रान्तों के, विभिन्न भाषाओँ, बोलियों में प्रस्तुत एक ही थीम पर गीत.सच में कितना अच्छा लगता था.स्कूली बच्चों ने टी.वी. देख देख कर राष्ट्र गान की तरह रट लिया था.पहली पंक्ति शुरू होते ही आगे की लाइनें खुद ब खुद दोहराए जाने लगते.सच में,विविधता में एकता को दर्शाती कितनी सुन्दर रचना.

पर, अब लोगों के सुर आपस में नहीं मिलते.प्रधान मंत्री के सुर अलग तो अन्य मंत्रियों के सुर अलग-अलग.एक ही पार्टी में सभी के सुर अलग-अलग.कोई बटला हाऊस मुठभेड़ को सही ठहराता है तो कोई इसमें साजिश ढूंढता है.कोई पुलिस अधिकारी की शहादत को याद करता है तो कोई इसे झूठा इनकाउंटर मानता है.मंत्रिमंडल के सदस्य संविधान की शपथ लेते हैं,लेकिन उसी संविधान को ठेंगा दिखाते नजर आते हैं.चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए पद और गोपनीयता के लिये गये शपथ की धज्जियाँ उड़ाते नजर आते हैं.

गुणीजन इसे आंतरिक लोकतंत्र या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कह सकते हैं.लेकिन एक ही मसले पर सुर का न मिलना……….. बाहर की बात तो जाने दें ,घर में ही लोगों के सुर आपस में नहीं मिलते.एक ही परिवार के पाँच सदस्यों के सुर आपस में नहीं मिलते.सबों के सुर अलग-अलग सुनाई देते हैं.कोई राग मालकौंस में आलाप ले रहा होता है तो दूसरा राग भैरवी में.लब्बोलुवाब यह कि यहाँ पर भी ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ सार्थक होता दिखाई न पड़ता.

संगीतकारों और गायकों को तो सुर मिलाने की खासी जरूरत पड़ती है.उनका सुर न मिले तो अर्थ का अनर्थ हो जाये.सो, सुर तो आपस में मिलाने ही पड़ते हैं.जाति,भाषा,धर्म की राजनीति सभी को आपस में सुर मिलाने ही नहीं देती.कई लोगों के सुर की तो अलग ही बात है.कई बार खुद ही लोगों के सुर बदले-बदले नजर आते हैं.

सो,हम तो इतना आशा कर ही सकते हैं कि…………

जो मिल जाएँ
तेरे मेरे सुर
जहाँ बदल जाये
न जाति औ धर्म की
राजनीति हो
न नफरत और घृणा की
बस प्रेम और सौहार्द की
फसल लहलहाए.

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
June 9, 2012

एकता के सन्देश के साथ aap ने आपसी सामंजस्य के महत्व को भी अपनी रचना से मुखर किया. बहुत सुन्दर राजीवजी

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 10, 2012

    यमुना जी,धन्यवाद ! आलेख की सराहना के लिए आपका आभार.

shashibhushan1959 के द्वारा
June 6, 2012

आदरणीय प्रदीप जी, सादर ! इन नेताओं के सुर तो कभी नहीं मिलेंगे ! हाँ ! जनता के सुर मिलते नजर आ रहे हैं, जिसे ये बेसुरे नेता स-सुर मानने को तैयार नहीं हैं ! सादर !

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    आदरणीय शशि जी,सादर.बड़े दिनों बाद आपकी प्रतिक्रिया दिखी.आपकी सहमति इस लेख के विषय के साथ दिखी,आपका आभार.

June 5, 2012

जो मिल जाएँ तेरे मेरे सुर जहाँ बदल जाये न जाति औ धर्म की राजनीति हो न नफरत और घृणा की बस प्रेम और सौहार्द की फसल लहलहाए………………आमीन!

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    धन्यवाद ! अनिल जी.सराहना के लिए आभार.

akraktale के द्वारा
June 5, 2012

आदरणीय राजीव जी नमस्कार, सही कहा आपने जब सारे सुर मिल जाते हैं तभी गीत बन पाता है किन्तु राजनेताओं के सुर तो आर्थिक स्वार्थ से नियंत्रित होते हैं जहां आर्थिक हानि दिखलाए पड़ी की सुर बदलने लगते हैं.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! आदरणीय अशोक जी.सराहना के लिए आभार.आपका कहना बिलकुल सही है कि राजनैतिक लोगों के सुर आर्थिक स्वार्थ से नियंत्रित होते हैं.स्वार्थ पूर्ति में बाधा होने पर सुर बदलने लगते हैं.

rekhafbd के द्वारा
June 5, 2012

आदरणीय राजीव जी ,सुर न मिलने के कारण ही आज देश की यह हालत हो गई है ,आभार

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    धन्यवाद ! रेखा जी.सराहना के लिए आपका आभार.

ajay kumar pandey के द्वारा
June 5, 2012

आदरणीय राजीव झा जी बहुत बढ़िया लिखा है आपने यह लेख जो न मिले सुर वाकई अगर सुर मिल जाए तो देश सोने की चिड़िया हो जाए आपके लेख पढ़कर आपके विचार अच्छे लगे धन्यवाद

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    धन्यवाद ! अजय जी.सराहना के लिए आभार.

anoop pandey के द्वारा
June 5, 2012

राजीव जी सभी के सुर मिले तो संगीत बन जाये…..और संगीत तो रुचिकर है………..शिव है. नेताओं के सुर न मिले न सही……….जनता के धीरे धीरे मिल रहे है और रास्त्र धर्म का गीत गाया भी जा रहा है………..जल्दी ही पूरा देश एक सुर में गायेगा. तब सब शिव ही होगा………..सुन्दर होगा. सुन्दर लेखन हेतु बधाई.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    धन्यवाद ! अनूप जी.आपकी उत्साह भरी सराहना के लिए आभार.

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 4, 2012

आदरणीय राजिव जी ….. सादर अभिवादन ! इस लेख को कुछ और भी बढ़ाया जा सकता था इसमें कुछेक और बाते भी अगर शामिल कर ली जाती तो और भी ज्यादा अच्छा होता अरे यह क्या ! हमारे आपसी सुर भी बदल गए ?….. अक्सर ही ऐसा हो जाता है इसमें हेरान नहीं होने का मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! आदरणीय राजकमल जी. किसी अच्छे विषय पर सबों का सुर मिलना स्वाभाविक ही है.लेकिन विवादस्पद विषयों को छोड़ दें तो सहमति वाले विषयों पर भी आजकल सुर नहीं मिलते.आपका कहना सही है कि आलेख में कुछ और विषयों को शामिल किया जा सकता था.आलेख की सराहना एवं ढेर सारे बल्बों के लिए आपका आभार.

allrounder के द्वारा
June 4, 2012

बहुत अच्छे राजीव जी …… किसी का किसी से सुर मिले न मिले मैं जरुर आपके सुर से सुर मिलाने की कोशिश कर रहा हूँ :) मिले सुर से सुर, सुरों की यहाँ गंगा बहे तेरे दिल की मैं कहूँ और मेरे दिल की तू कहे …..

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! सचिन जी.बड़े दिनों बाद आपकी प्रतिक्रिया मिली,बहुत अच्छा लगा.किसी अच्छे विषय पर सबों का सुर मिलना स्वाभाविक ही है.बहरहाल,आलेख की सराहना के लिए आपका आभार.

dineshaastik के द्वारा
June 4, 2012

आदरणीय राजीव जी सुर न  मिलना ही सारी समस्याओं का कारण  हैं। अन्ना और  रामदेव के आन्दोलन  की सफलता के  मूल  में किसी पार्टी में आपस  में सुर न  मिलना ही है। परिवारों  में विखराव भी इसी सुर न  मिलने के कारण  ही है। बहुत ही सटीक  आलेख…बधाई….

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    आदरणीय दिनेश जी,धन्यवाद ! सराहना के लिए आपका आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 4, 2012

आदरणीय राजीव जी, सादर अभिवादन बहुत अच्छी सोच का प्रदर्शन बधाई

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी,सादर.सराहना के लिए आभार.आप का स्नेह यूँ ही हम सब पर बना रहे,यही कामना है.

चन्दन राय के द्वारा
June 4, 2012

राजीव जी , आपके इस नए सुर ने तो दिल के सुर बजा दिय , सुर तो आपसे पाहिले ही मिले हुए थे , और दिल भी तो हाँ इक नया सुर बन गया हमारा बहुत सुन्दर रचना

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    धन्यवाद ! चन्दन जी.सराहना के लिए आभार.

nishamittal के द्वारा
June 4, 2012

सुर मिले बिना तो कुछ भी संभव नहीं राजीव जी पर आज तो न राजनैतिक दलों के सुर अपने सदस्यों से ही नहीं मिलते.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    आदरणीया निशा जी,धन्यवाद.सही कहा आपने.आजकल राजनैतिक दलों के सदस्यों के सुर आपस में नहीं मिलते,लेकिन वेतन भत्तों को बढ़ाने की बात पर सबों के सुर एक हो जाते हैं.

vikramjitsingh के द्वारा
June 4, 2012

आदरणीय राजीव जी……अभिवादन…. आज तो…. बदले-बदले से…..सरकार नज़र आते हैं…….

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    June 8, 2012

    नमस्कार एवं धन्यवाद ! विक्रम जी.देखिए! आपने भी मेरे सुर में सुर मिला लिया.सराहना के लिए आभार.


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