कहना है

कई बार बहुत कुछ कहने का मन करता है.लेकिन शब्द नहीं मिलते.कागज कोरे ही रह जाते हैं.शब्द जब लेखनी के रूप में ढलता है तो इस ब्लॉग के रूप में प्रकट होता है.

36 Posts

1257 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 7781 postid : 314

एक फुटपाथी कवि का दर्द

Posted On: 30 Mar, 2013 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Poet

कल मैंने अपनी अप्रकाशित

कविताओं का एक बण्डल

नुक्कड़ के कोने पर बैठने वाले

छोले बेचने वाले को सौंप दिया

उसने इसे मुँह बंद करके हँसते हुए

स्वीकार कर लिया

और उसने द्वेष से

प्रभावित हुए बिना

जबाब दिया

अंततः महोदय

अब आपकी कविताएँ पढ़ी जाएँगी .


मैं उन सभी लोगों के बारे में सोचता हूँ

जो नमकीन छोले खरीदते हैं

और हाथ में गर्म दोने पकड़ते हुए

जिसके नीचे मेरी कविताएँ रहती हैं

कुछ ध्यान देते हैं और कुछ बिलकुल नहीं,

और मैं अपनी खुशामद करते हुए सोचता हूँ

एक व्यक्ति को यह बोनस में प्राप्त होता है

पांच रूपये खर्च करते हुए .


अपने घर की ओर जाते हुए

दुविधा में और शायद प्रसन्नता से

वह कविता को पढ़ता है

तब अपने हाथों की गन्दगी को

उसी कागज से पोंछ डालता है

वह कागज को नीचे गिरा देता है

जो फड़फड़ाते हुए फुटपाथ पर जा गिरता है

तब वह किसी उत्सुक राहगीर से उठाया जाता है .

मैं अपने जेब में पांच रूपये रखते हुए

अपने घर की ओर जाता हूँ

छोले वाले की बातों का

चिंतन करते हुए सोचता हूँ

अनजाने में उसके द्वारा दिया गया

रिश्वत शायद रिश्वत नहीं है

और बिना किसी विद्वेष से

मैं एक और फुटपाथी कवि हूँ .

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

11 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jobeth के द्वारा
July 11, 2016

Sabrina comentou em 3 de dezembro de 2009 às 16:10. Tô super compulsiva… kkkkk e preciso aproveitar que uma prima vem de NY no fim do ano para pedir aquelas encomendas bÃ3#sicas&¡82Â0;.. não achei no site da Mac o iluminador que vc usa…. como é mesmo o nome? Tenho a pela morena como a da Marina que tom ficaria legal?

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 1, 2013

आदरणीय राजीव सर जी सादर अभिवादन मैं उन सभी लोगों के बारे में सोचता हूँ जो नमकीन छोले खरीदते हैं और हाथ में गर्म दोने पकड़ते हुए जिसके नीचे मेरी कविताएँ रहती हैं कुछ ध्यान देते हैं और कुछ बिलकुल नहीं, और मैं अपनी खुशामद करते हुए सोचता हूँ एक व्यक्ति को यह बोनस में प्राप्त होता है पांच रूपये खर्च करते हुए अपना भी हाल तेरे जैसा है क्या करें हम भाग्य ही ऐसा है बधाई.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 1, 2013

    आदरणीय प्रदीप जी ,सादर . आपकी स्नेहपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए आभार . आपकी पंक्तियों को पूरा करने की धृष्टता कर रहा हूँ ……….. अपना हाल भी तेरे जैसा है कहते सब कवि कैसा – कैसा है

yogi sarswat के द्वारा
April 1, 2013

अपने घर की ओर जाते हुए दुविधा में और शायद प्रसन्नता से वह कविता को पढ़ता है तब अपने हाथों की गन्दगी को उसी कागज से पोंछ डालता है वह कागज को नीचे गिरा देता है जो फड़फड़ाते हुए फुटपाथ पर जा गिरता है तब वह किसी उत्सुक राहगीर से उठाया जाता है . ये हिंदी कवी की किस्मत है श्री झा साब लेकिन इन्हें फुट पाथ कवियों में से कल को कोई प्रेम चाँद और मैथिलि शरण भी निकल आता है ! एक आप बीती सुनाता हूँ ! मैं शायद पहली बार दिल्ली आया था , पुरी दिल्ली स्टेशन के बाहर निकल कर कहीं दूर जगह ब्रेड पकोड़ा खा रहा था ! उस व्यक्ति ने नवभारत टाइम्स अखबार की रद्दी पर रख कर दिया था वो ब्रेड पकोड़ा ! जब वो ख़त्म हो गया तो उस पर नज़र पड़ी ! हालाँकि वो कागज़ चिकन हो गया था लेकिन फिर भी पढ़ सकता था ! उसमें लिखा था , नए कवियों से “यूनिसेफ द्वारा राजीव गाँधी युवा कवि पुरस्कार ” के लिए अप्रकाशित रचनायें आमंत्रित करी जाती हैं ! मैंने भी भेज दी ! और ११००० रुपये और एक मोमेंटो मिला ! ५ दिन का फाइव स्टार होटल में स्टे और दिल्ली दर्शन एक मित्र के साथ ( तब शादी नहीं हुई थी ) तो फूत्पाथिये कवि , कभी कभी मौका मार लेते हैं !

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 1, 2013

    योगी जी ,सादर . आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए आभार .आपने बहुत सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है .लेकिन सभी किस्मत वाले कहाँ होते हैं . वो कहते हैं न ………… कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

nishamittal के द्वारा
March 31, 2013

भावों से पूर्ण मर्मस्पर्शी रचना राजीव जी.

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 1, 2013

    आदरणीय निशा जी ,सादर . सराहना एवं प्रतिक्रिया के लिए आभार .

jlsingh के द्वारा
March 31, 2013

आदरणीय झा जी, सदर अभिवादन! बहुत पहले या अभी भी जब कागज पर रखकर बादाम खाता हूँ, उस कागज पर लिखे आलेख या कविता को बड़े ध्यान से पढता हूँ…उतना ध्यान शायद समाचार पत्र या पत्रिकाओं को भी नहीं दे पता हूँ! फूटपाथी कवि …और फूटपाथी पाठक! आपने एक कवि के दर्द को उभारा है! समझ सकता हूँ!

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 1, 2013

    आदरणीय जवाहर जी ,सादर .बहुमूल्य प्रतिक्रिया एवं सराहना के लिए आभार .एक फुटपाथी कवि के दर्द से रूबरू हुए, यह आपकी संवेदनशीलता को दर्शाता है .

ashvinikumar के द्वारा
March 30, 2013

स्नेही राजीव जी ,सादर अभिवादन ,,,यह दर्द बड़ा बेदर्द है , इसका क्या कहना ,हम तो अपनी सुनाते हैं ,मर्जी हो सुनना या मत सुनना ,,,…………………….सच मे कविता फर्श से ही अर्श पर जाती है ……….जय भारत

    RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
    April 1, 2013

    अश्विनी जी ,सादर .प्रतिक्रिया एवं सराहना के लिए आभार .बिलकुल सही कहा आपने कविता फर्श से ही अर्श पर जाती है .कवि तो प्रयास ही कर सकते हैं . जय भारत .


topic of the week



latest from jagran